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"क्षत्रिय एकता"(कविता)

कब तक सोये रहोगे, सोने सेँ क्या हासिल हुआ,
व्यर्थ अपने वक्त को, खोने से क्या हासिल हुआ,
शान और शौकत हमारी जो कमाई वीरो नेँ,
वो जा रही , अब सिर्फ बैठेँ रहने से क्या हासिल हुआ,

सोती हुई राजपूती कौम को जगाना अब पडेगा,
गिर ना जाये गर्त मेँ "वीरो" को उठाना अब पडेगा,
बेड़िया "रूढिवादिता" की पडी हुई जो कौम मेँ,
उन सभी बेडियो को तोडना अब पडेगा,
संतान हैँ हम उन "वीरो" की वीरता है जिनकी पहचान,
तेज से दमकता मुख और चमकती तलवार है उनका निशान.
वीरता की श्रेणी मेँ "क्षत्रियो" का पहला हैँ नाम,
झूठला नही सकता जमाना, इतिहास है साक्षी प्रमाण,
प्रहार कर सके ना कोई अपनी आन-बाण-शान पर,
जाग जाओ अब ऐ "वीरो" अपने महाराणा के आवहान् पर,
शिक्षा और संस्कारो की अलख जगाते अब चलो,
कहे 'गोविन्द' राह से भटके "वीरो" को संग मिलाते अब चलो,
फूट पडने ना पाए अपनी कौम मेँ अब कभी,
"क्षत्रिय एकता" ऐसी करो के मिसाल दे हमारी सभी,
कोई कर सके ना कौम का अपनी उपहास,
आओ "एक" होकर रचे हम,
अपना "स्वर्णिँम" इतिहास ॥
"जय क्षात्र धर्म"

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