"रजवट रो थूं सेहरौ, सब सूरां सिरमौङ ।
धरती पर धाका पङै, रंग पाबू राठौड़ ।।
"घोङो, जोङो, पागङी, मूछां तणी मरोड़ ।
ऐ पांचू ही राखली, रजपूती राठौड़ ।।
रा जा झुके, झुके मुग़ल मराठा, राजा झुके, झुके मुग़ल मराठा, झुक गगन सारा। सारे जहाँ के शीश झुके, पर झुका न कभी "सूरज" हमारा।। झिरमिर झिरमिर मेवा बरसे ! झिरमिर झिरमिर मेवा बरसे मोर...
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