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हाँ मैं क्षत्रिय हूँ

हाँ मैं क्षत्रिय हूँ

हाँ !

में हूँ,
इस धरोहर
का उत्तराधिकारी !
सींचा था मेरे पुरखों ने

जिसे अपने
ही रक्त
से.

और !
बचाकर
रखा था जिसे,
लिखकर "क्षत्रिय" धरा पे,
दुश्मन
के रक्त
से .

में
प्रहरी हूँ
क्षत्रिय संस्कारों की
इस अथाह दौलत का ,नीवं में
जिसकी जौहर और शाका
का पाषाण पिंघला
कर डाला था
मेरे अपनों
ने .

मुझे
फिर से
पाना है उस रुतबे को
और छिनना है वक़्त के जबड़ों से
उस खोये सम्मान को
पाने को जिसे
गुजारी थी उम्र
युद्धों
में
लेखक- श्री विक्रम शेखावत

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