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कविता: हल्दी घाटी का रण

आओ वीरोँ और वीरांगनाओ!
कराता हुँ तुम्हे सैर हल्दिघाटी की!!
जहाँ आह निकले तुर्को के मुँह से!
वहाँ वाह निकली वीरो के मुख से!!
सन 1574 मे छेडी राणा उदय सिँहजी ने जंग!
किया तुर्को को दंग!!
हुई अकबर की नीँद भंग!
जब खडे हुए सहासी राजपूत वीर राणा के संग!!
1576 मे शुरु हुआ,
हल्दिघाटी मे रण!
राजा मान जीत लेगा ये जंग,
था अकबर को ऐसा भ्रम!!
न आया वो तुर्क रण,
डरता था वो प्रताप से जम!
जब राणा ने चलाया भाला,
चेतक को जब राणा ने उछाला!!
राजा मान जा दुबका,
महावत का शीष कटा!!
उछाल मे लगा,
चेतक के पग मे घाव!
न रुका वो सहकर घाव,
छाया राणा के मुख पर एक गहरा भाव!!
राणा को निकला जब चेतक रण से,
तब किया पिछा मुल्तान और खुरासण ने!
तब आए शक्ती सिँह महाराज,
दिया मुल्तान और खुरासण को आघाज!!
जब त्यागे चेतक ने अपने प्राण,
नही रहा राणा को भान!
ऐसा था वो हल्दीघाटी का रण महान,
जिसने बढाई राजपुताना की शान!!
कवी 'अक्षय' करे वीरो को नमन,
निकल जाएगा रण की तारीफ मे उसका यौवन!
पर न होगा खत्म हल्दीघाटी का रण!!
पर न होगा खत्म हल्दीघाटी का रण!!
:- 'अक्षय' कुँवर विश्वजीत सिँह सिसोदिया 'जिन्दादिल'

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