दारूरा दुरगण( शराब से होने वाले नुकसान को दोहों में लिखा गया है)
ये शराब हमे कंहा से कंहा ले आयी।क्या थे और क्या रह गए। वास्तव में हमारी समाज की दुर्गति का एक कारण शराब भी है। इससे होने वाले नाश को देखकर भी इससे मोह क्यों नही छुट रहा है? आज हमारी शान इस बोतल तक ही है क्या? तभी तो कुछ लोग हाथ में प्याले पकडे फोटो डालते है इंटरनेट पर और लिखते है रॉयल राजपूत। अब यह समझ में नही आता कि शराब पिने वाला ही रॉयल राजपूत होता है बाकि तो आम राजपूत। :-(
किसी कवी ने शराब से होने वाले नुकसान को अपनी देशी भाषा में बहुत ही सुन्दर शब्दों में लिखा है अगर समझ में आ गए तब तो जरूर दिल को छु जाएंगे ये दोहे।
पिण्ड झड़े, रोबा पड़े, पड़िया सड़े पेंशाब।
जीब अड़े पग लडथड़े, साजन छोड़ शराब (१)
कॉण रहे नह कायदो, आण रहे नह आब।
(जे) राण बाण नित रेवणो,(तो) साथी छोड शराब (२)
जमीं साख जाति रहे, ख्याति हुवे खराब।
मुख न्याति रा मोड़ले, साथी छोड़ शराब (३)
परणी निरखे पीवने, दॉत आंगली दाब।
भॉत भॉत मांख्यां भमे, साजन छोड़ शराब (४)
आमद सू करणो इधक, खरचो घणो खराब ।
सदपुरखॉ री सीखहे, साथी छोड़ शराब (५)
सरदा घटे शरीर री, करे न गुरदा काम।
परदा हट जावे परा, आसव छोड़ अलाम (६)
कहे सन्त अर ग्रंथ सब, निष्चय धरम निचोड़ ।
जे सुख चावे जीवणो, (तो) छाक पीवणो छोड़ (७)
मोनो अरजी रे मनां, मत कर झोड़ झकाळ।
छाक पीवणी छोड़दे, बोतल रो मुॅहबाळ (८)
चंवरी जद कंवरी चढी, खूब बणाया ख्वाब ।
ख्वाब मिळगया खाक मे, पीपी छाक शराब (९)
घर मोंही तोटो घणों, रांधण मिळे न राब।
बिलखे टाबर बापड़ा, साजन छोड़ शराब (१0)
दारू में दुरगण घणा , लेसमात्र नह लाब ।
जग में परतख जोयलो , साथी छोड़ शराब (११)
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