Skip to main content

था सूर्य चमकता राजपूतो का...

था सूर्य चमकता राजपूतो का,
घनघोर बदरिया डरती थी।
था शेर गरजता सीमाओ पर,
बिजली भी आहे भरती
थी।
है खून वही उन नब्जों मे,
फिर क्यो वर्षो से सोते हो।
लूटा है चंद सियारो ने,
फिर क्यो इन्हे मौका देते हो।
अब चीर दो सीना काफिर के,
तलवार वही पुरानी है।
रक्षक हो तुम इस भारत के,
ललकार रही भवानी है।

जय क्षात्र धर्म की

Comments

Popular posts from this blog

राजपूती दोहे

रा जा झुके, झुके मुग़ल मराठा, राजा झुके, झुके मुग़ल मराठा, झुक गगन सारा। सारे जहाँ के शीश झुके, पर झुका न कभी "सूरज" हमारा।। झिरमिर झिरमिर मेवा बरसे ! झिरमिर झिरमिर मेवा बरसे मोर...

राजपूती दोहे

•» ” दो दो मेला नित भरे, पूजे दो दो थोर॥ सर कटियो जिण थोर पर, धड जुझ्यो जिण थोर॥ ” मतलब :- •» एक राजपूत की समाधी पे दो दो जगह मेले लगते है, पहला जहाँ उसका सर कटा था और दूसरा जहाँ उसका ध...

वीर योद्धा वीरमदेव के दोहे

मामा लाजै भाटिया कुल लाजै चहुॅआन । मूॅ परणूला तुरकडी तो अवलो ऊगे भाण ।। सोनगरो वंको क्षत्रिय अणरो जोश अपार । झेले कुण अण जगत मे वीरम री तलवार ।। बावीसी फौज करी विध विध गढ जाल...