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जूंझार जीवकरणजी

       ✍काव्य-रचना✍ किण भात लिखू म्है म्हनै बता, जीवकरण रे वीरता री गाथाl आ कलम केवती क्यु सिसके, निश्वास छोड़ती अब हाथा ll जीवकरण जूंझार री अमर कहानी, जद् लिखवा ने हुँ तैयार हु...

लग रहा है सिंहनी के कोख से पैदा हुआ हूँ...

माँ तुम्हारा लाडला रण में अभी घायल हुआ है... पर देख उसकी वीरता को, शत्रु भी कायल हुआ है... लग रहा है सिंहनी के कोख से पैदा हुआ हूँ... रक्त की होली रचा कर, मैं प्रलयंकारी दिख रहा हूँ ... म...

!!!!जरा याद क्षात्र धर्म को करलो!!!!

भूल क्षत्रिय धर्म को ,मात्र राजपूत हम बन गये, छोङे दिये सारे क्षत्रिय सँस्कार,और अँहकार मे तन गये । क्षत्रिय धर्म मे पलने वाले, शिर कटने पर भी लङते थे, होता अगर अन्याय और पाप क...

क्षत्रिय पथ बिना रजपूती ना बणे रे भाईयों

क्षत्रिय ! ! मित्रों ! क्षत्रिय पथ बिना रजपूती ना बणे रे भाईयों , लाख करो विचार । पथ छोङिया मँजिल ना मिले रे भाईयों , जतन करो हजार । मर्यादा रखी राजा राम ने रे भाईयों ,दुनिया पुजे ब...

जद रजपुती भाल चमकतो...

जद देखूँ मैं उगतो सूरज,रीस घणी ही आव है। उगतो छीपतो सुरजड़ो ओ टीस घणी दे ज्यावे हैं।। उगतोड़ो तो रजपुती रो जसड़ो याद दिराव है। छीपतोड़ो तो रजपुती री,पतन री बात बताव है।। जद जद देखूँ रजपुती न,सनाँ में समझाव है। कठ्य गया ब रणधीरा,बाँ री याद घणी ही आव है।। जद रजपुती भाल चमकतो,सुरजड़ो ओट लगावो हो। धरा हालति पगल्यां सुं,जद कोई कुख सिघणी री जावो हो।। रजपुती तो बा ही कहिजे,रजवट कायर कीकर है। खून खोळतो ठण्डो कीकर,नाड्यां ढीली कीकर है।। लेखनी कुं नरपत सिंह पिपराली

हल्दीघाटी

निर्बल बकरों से बाघ लड़े¸ भिड़ गये सिंह मृग–छौनों से। घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी¸ पैदल बिछ गये बिछौनों से।।1।। हाथी से हाथी जूझ पड़े¸ भिड़ गये सवार सवारों से। घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े¸ तलवार लड़ी तलवारों से।।2।। हय–रूण्ड गिरे¸ गज–मुण्ड गिरे¸ कट–कट अवनी पर शुण्ड गिरे। लड़ते–लड़ते अरि झुण्ड गिरे¸ भू पर हय विकल बितुण्ड गिरे।।3।। क्षण महाप्रलय की बिजली सी¸ तलवार हाथ की तड़प–तड़प। हय–गज–रथ–पैदल भगा भगा¸ लेती थी बैरी वीर हड़प।।4।। क्षण पेट फट गया घोड़े का¸ हो गया पतन कर कोड़े का। भू पर सातंक सवार गिरा¸ क्षण पता न था हय–जोड़े का।।5।। चिंग्घाड़ भगा भय से हाथी¸ लेकर अंकुश पिलवान गिरा। झटका लग गया¸ फटी झालर¸ हौदा गिर गया¸ निशान गिरा।।6।। कोई नत–मुख बेजान गिरा¸ करवट कोई उत्तान गिरा। रण–बीच अमित भीषणता से¸ लड़ते–लड़ते बलवान गिरा।।7।। होती थी भीषण मार–काट¸ अतिशय रण से छाया था भय। था हार–जीत का पता नहीं¸ क्षण इधर विजय क्षण उधर विजय।।8।। कोई व्याकुल भर आह रहा¸ कोई था विकल कराह रहा। लोहू से लथपथ लोथों पर¸ कोई चिल्ला अल्लाह रहा।।9।। धड़ कहीं पड़ा¸ सिर कहीं पड़ा¸ कुछ भी उनकी पहचान नहीं। शोणित का ऐसा वेग ...

रियासत कालीन आम राजपूत की जिंदगी

एक आम राजपूत जिसने रजवाड़ो की आन बान शान के लिए अपनी पूरी जिंदगी लूटा दी लेकिन रजवाड़ो से जिस सम्मान की वो अपेक्षा  करता था नहीं मिलने पर उसका मन द्रवित हो उठता है और इस पीड़ से उसके मन में कुछ भाव और विचार उभरते है और वो उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने की छोटी सी कोशिस करता है। ना रजवाड़ा म जन्म लियो, न ही गढ़ रो राज। दरबारां री धोख मारां जद मिळ है दो मण नाज।। राज करणिया राज करयो, म्हे तो चौकीदार। रण लड़ता र शीश चढ़ाता, साथण ही तरवार।। साथण ही तरवार, राजा री शान बचावण न। ब जनम्या  कूबद कमावण न म्हे जनम्या रण में खून बहावण न।। म्हे जनम्या रण म खून बहावण न ब जनम्या राज रो काज चलावण न। म्हे जनम्या हुकुम निभावण न ब जनम्या हुकुम सुणावण न।। ब जनम्या सोना रा थाळ म खावण न म्हे जनम्या सुखा टूक चबावण न। ब जनम्या फूला री सेज सजावण न म्हे जनम्या रातां री नींद जगावण न।। ब जनम्या मद र रास रचावण न म्हे जनम्या रजवाड़ी लाज बचावण न। ब जनम्या खुद रो नाम कारावण न म्हे जनम्या कौम रो मान कमावण न।। जन्मभोम र मान र खातर खुद रो खून बहायो है। बाँ न अमर राखबा खातर मन्न थे बिसरायो है।। मेरो खून रो मोल छिप...